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स्मार्ट प्रीपेड मीटर विवाद: यूपी सरकार का यू-टर्न और अंदरूनी दबाव

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PARDARSHI VIKASH NEWS उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर उठे भारी जनविरोध के बाद सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया है। बताया जा रहा है कि यह कदम अचानक नहीं था, बल्कि जनता के गुस्से, राजनीतिक दबाव और संगठनात्मक फीडबैक का नतीजा था। सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले पर न सिर्फ जनता में नाराजगी बढ़ रही थी, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्तर पर भी सरकार को लगातार फीडबैक मिल रहा था कि अगर यह मुद्दा समय रहते नहीं संभाला गया तो आगामी चुनावों में नुकसान हो सकता है।जनता का विरोध इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आया। प्रदेश के कई शहरों—लखनऊ, कानपुर, आगरा, प्रयागराज, वाराणसी और मथुरा—में लोगों ने स्मार्ट मीटर के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया था। आरोप था कि बिना सहमति मीटर बदले गए, बिल अचानक बढ़ गए और शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा। कई जगहों पर लोग अपने घरों से मीटर तक उखाड़कर बिजली विभाग के दफ्तरों तक पहुंच गए। यह आंदोलन किसी एक नेतृत्व में नहीं था, लेकिन इसका असर तेजी से पूरे प्रदेश में फैल गया।इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने स्मार्ट मीटर की तुलना EVM से करते हुए इसे “स्कैम” बताया, जबकि आम आदमी पार्टी ने इसे “स्मार्ट चीटर” करार देते हुए प्रदर्शन किए। विपक्ष के बढ़ते दबाव और जनता के गुस्से ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दीं।इसी बीच पार्टी और संगठन स्तर पर ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के खिलाफ भी लगातार निगेटिव फीडबैक पहुंच रहा था। बताया जा रहा है कि इन्हीं परिस्थितियों में सरकार पर दबाव बढ़ा और अंततः प्रीपेड मीटर प्रणाली को वापस लेने का फैसला किया गया। अब उपभोक्ताओं को पुराने सिस्टम की तरह मासिक बिलिंग और किस्तों में भुगतान की सुविधा दी गई है।इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि बिजली व्यवस्था में तकनीकी बदलाव अगर जनता के विश्वास और पर्याप्त तैयारी के बिना लागू किए जाएं, तो वे बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले सकते हैं।