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पर्वराज दसलक्षण धर्म का तीसरा दिन "उत्तम आर्जव धर्म"

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वाराणसी । जैन धर्म में वर्णित उत्तम आर्जव धर्म का तात्पर्य है – जीवन में सीधापन, सच्चाई और निष्कपटता का पालन। आर्जव का अर्थ है सरलता और छल-कपट से मुक्त व्यवहार। यह धर्म हमें सिखाता है कि व्यक्ति का आचरण भीतर और बाहर से समान होना चाहिए। जो सोचें वही बोलें और जैसा बोलें वैसा ही आचरण करें – यही आर्जव है। मनुष्य का सबसे बड़ा दोष कपट और दुराचार है। कपटी व्यक्ति बाहर से कुछ और दिखाई देता है लेकिन भीतर कुछ और होता है। ऐसे व्यक्ति के विचार और कर्मों में विरोधाभास रहता है, जिससे न केवल उसका जीवन अशांत होता है बल्कि समाज में भी अविश्वास और कलह फैलता है। इसके विपरीत, आर्जव धर्म अपनाने वाला व्यक्ति अपने हृदय की सच्चाई को व्यवहार में उतारता है। उसकी वाणी, विचार और कर्म में एकरूपता होती है। यही एकरूपता उसे आत्मिक शांति और समाज में विश्वास दिलाती है। उत्तम आर्जव धर्म केवल साधारण गुण नहीं बल्कि आत्मा की पवित्रता का प्रतीक है। कपट, छल, धोखा और पाखंड आत्मा को कलुषित करते हैं और मोक्ष मार्ग में बाधक बनते हैं। इसलिए आर्जव धर्म का पालन करने वाला साधक आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होता है ।।