
Pardarshi Vikas News
वॉशिंगटन डीसी से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ 38 दिन चले युद्ध में अमेरिका ने बड़ी मात्रा में उन्नत और महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिससे उसके रणनीतिक हथियार भंडार पर दबाव बढ़ गया है। बताया जा रहा है कि कई ऐसी मिसाइलें भी इस्तेमाल हुईं, जिन्हें चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी देशों के खिलाफ संभावित संघर्ष के लिए सुरक्षित रखा गया था।
युद्ध के दौरान अमेरिका ने करीब 1100 लंबी दूरी की स्टील्थ JASSM-ER मिसाइलें दागीं। ये मिसाइलें दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को चकमा देकर 600 मील से अधिक दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम मानी जाती हैं। इसके अलावा 1000 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलें, 1200 से ज्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर और बड़ी संख्या में अन्य प्रिसिजन स्ट्राइक हथियारों का भी इस्तेमाल हुआ।
रिपोर्ट के मुताबिक पूरे अभियान पर 28 से 35 अरब डॉलर तक खर्च हुआ, यानी प्रतिदिन लगभग 1 अरब डॉलर या करीब 90 अरब रुपये। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में हथियारों का उपयोग अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य तैयारी को प्रभावित कर सकता है।
युद्ध के बाद अमेरिका को एशिया और यूरोप से भी सैन्य संसाधन मध्य-पूर्व भेजने पड़े। दक्षिण चीन सागर से नौसैनिक समूह हटाया गया, जबकि कुछ मिसाइल रक्षा प्रणालियां भी अन्य क्षेत्रों से स्थानांतरित की गईं। इससे वहां तैनात अमेरिकी सुरक्षा ढांचे पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि व्हाइट हाउस ने हथियार खत्म होने या गंभीर कमी के दावों को खारिज किया है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिका के पास पर्याप्त सैन्य क्षमता मौजूद है और उसकी सेना दुनिया की सबसे मजबूत सेनाओं में शामिल है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती इस्तेमाल हुए हथियारों की भरपाई करना है। उत्पादन बढ़ाने के लिए रक्षा कंपनियों से समझौते किए गए हैं, लेकिन मौजूदा रफ्तार से पुराने स्तर का भंडार बहाल करने में कई साल लग सकते हैं। इससे भविष्य की वैश्विक सैन्य रणनीति पर भी असर पड़ सकता है।