
ग्लोबल वार्मिंग से निपटना जरूरी, कई शहरों में स्वच्छ हवा संकट
संजीव भारती/ललित कुमार
पारदर्शी विकास न्यूज़ अमेठी। विश्व पृथ्वी दिवस बुधवार को दुनिया के अधिकांश देशों में मनाया गया। कार्यक्रम स्थानीय समय के अनुसार देर शाम तक चलते रहे। पृथ्वी दिवस पर जन-जागरूकता पर प्रकृति के स्वरूप को बिगाड़ने की कोशिशें भारी हैं। भारत में सबसे अधिक संकट कंक्रीट के जंगलों ने पैदा किया है। सुरक्षित जीवन के लिए हरियाली बढ़ना सबसे जरूरी है।आने वाली पीढ़ी के लिए पृथ्वी को बचाना हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।पृथ्वी दिवस पर पारदर्शी विकास ने पर्यावरण सेवियों और प्रकृति प्रेमियों से बातचीत की।अमेठी जल बिरादरी के अध्यक्ष डॉ अर्जुन पांडेय ने कहा कि पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल को दुनिया भर के देशों में पर्यावरण संरक्षण के लिए होता है। पहला पृथ्वी दिवस मिशीगन विश्वविद्यालय में अमेरिकी सीनेटर गेलार्ड नेल्सन ने 1970 में पर्यावरण शिक्षा के रूप में की थी।आज दुनिया के 194 से अधिक देशों में प्रतिवर्ष पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। संज्ञान रहे इस समय उत्तरी गोलार्ध में वसंत एवं दक्षिणी गोलार्ध में शरद ऋतु का मौसम रहता है।22 मार्च विषुव (इक्वीनोकस) को वर्ष का वह दिन जब दिन-रात बराबर रहता है।पृथ्वी दिवस दुनिया के देशों में जागरूकता बढ़ाने और धरती को सुरक्षित रखने के साथ मनाया जाता है।दुनिया के पहले पृथ्वी दिवस में 141 देश शामिल हुए थे।पृथ्वी दिवस मनाने का उद्देश्य - हमारी शक्ति हमारा ग्रह - धरती बचाओ जीवन बचाओ का नारे के साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता,वनों की कटाई न हो साथ ही पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में शिक्षित करने के साथ हरित भविष्य का निर्माण करना है।भूगर्भ वेत्ताओं सहित पौराणिक कथाओं के अनुसार आज के लगभग 70 करोड़ वर्ष पूर्व धरती की पहली जमीन भारत में समुद्र निकली। पैंजिया और पैंथालसा विलग हो गये।सर्व विदित है जीवन्त ग्रह पृथ्वी सौर्य परिवार का तीसरा ग्रह है,जो सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी की दूरी पर है। सूर्य तप्त गैस का गोला है जो ऐरावत ब्रह्मांड में स्थित है,जिसमें 13 लाख पृथ्वी समा सकती है।सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश आने में 8 मिनट 22 सेकेंड लगता है।पृथ्वी 365 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है।पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा है।पृथ्वी पर लगभग 71 प्रतिशत जलीय भूभाग,सागरों एवं महासागरों तथा ग्लेशियर,ध्रुवीय बर्फ,भूजल,झीलों एवं वायुमंडल में वितरित है।पृथ्वी का मात्र तीन प्रतिशत जल पीने योग्य है।वर्तमान में पृथ्वी दिवस मात्र दिवस बनकर रह गया है।मौसम का बदलता स्वरूप,कभी झूरा कभी बूड़ा,भूकम्प एवं ज्वालामुखी आदि आपदाएं मौसम के साथ धरती की मिजाज बदलने की ओर अग्रसर हैं।पृथ्वी आवश्यकता की आपूर्ति कर सकती है लोभ-लालच की नही।उद्दाम भोगवाद चरम पर है।प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की लालसा ने उलट पुलट कर दिया है।प्रकृति और धरती का ग़ुस्सा चरम पर है।अगर समय रहते न चेते तो प्रकृति समय रहते अपना समायोजन आपदाओं के रूप में कर लेगी। चिंता का विषय धरा तो धरी रह जाएगी जीव-जगत का क्या होगा।पृथ्वी दिवस की प्रासंगिकता भूमि हमारी माता हम सब उसकी संतान की भावना में निहित है। उद्दाम भोगवाद, आधुनिकता से बचते हुए प्रकृति पर विजय पाने के बजाय प्रकृति प्रेम एकमात्र समाधान है।भूतल की समस्त वस्तुएं अपने अपने क्षेत्र में यथावत क्रियाशील रहेंगी इससे न केवल उपहार स्वरूप प्राप्त वस्तुओं का संरक्षण होगा अपितु जीव-जगत स्वयं सुरक्षित रहेगा।धरती केपटाउन न बने इसके लिए सबको सचेत होना पड़ेगा।
वैज्ञानिक विकास से बिगड़ा प्रकृति का स्वरूप: डॉ. रूदल यादव
पृथ्वी दिवस के अवसर पर अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डॉ. रूदल यादव ने नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति की नैसर्गिक सुगंध को बचाने की अपील की।उन्होंने कहा कि आधुनिक उपभोक्तावादी जीवनशैली और औद्योगिक विकास ने प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण अवनयन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। उन्होंने ओजोन परत के क्षरण को भी मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा बताया।