
वैशाली में अभी भी चर्चा में रहता है नगर वधू आम्रपाली का इतिहास
पारदर्शी विकास न्यूज़ अमेठी।अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध धम्म तीर्थ यात्रा के बैनर तले बौद्ध धम्म तीर्थ यात्रियों का दल सातवें दिन शुक्रवार को कुशीनगर पहुंचा। धम्म यात्रियों ने भगवान गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल पर लेटी मुद्रा की प्रतिमा का दर्शन किया और भंते शीलवंश की अगुवाई में सामूहिक चीवर दान किया गया। कुशीनगर के भंते बुद्धयांगा गौतम और शीलवंश ने उपासकों के याचना पर त्रिसरण पंचशील ग्रहण कराया। भंते बुद्धयांगा गौतम ने कुशीनगर से भगवान बुद्ध के जुड़े हुए सभी बातों को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि भगवान गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण के 483 ईसा पूर्व में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था।गौतम बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।कुशीनगर के सालवन (शाल के वृक्षों के उपवन) में हुई थी।बौद्ध धर्म में जीवित रहते हुए तृष्णा और मोह से मुक्त होने को 'निर्वाण' कहा जाता है, और मृत्यु के बाद शरीर तथा संसार से पूर्ण मुक्ति को 'महापरिनिर्वाण' माना जाता है।शुक्रवार को यात्रा का नेतृत्व हरिश्चंद्र कोरी ने किया। सुबह 11:00 बजे भोजन के बाद यात्रियों ने भगवान बुद्ध के अंतिम संस्कार स्थल का दर्शन करके कपिलवस्तु के लिए रवाना हुए अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध धम्म तीर्थ यात्रा के बैनर तले धाम यात्रियों का दल छठवें दिन वैशाली विश्व को शांति स्तूप के साथ स्तूप कलश स्थल और बुद्ध सम्यक दर्शन संग्रहालय एवं स्मृति स्तूप वैशाली का भ्रमण किया। भंते धम्म ज्योति और शीलवंश ने त्रिसरण पंचशील ग्रहण कराया। वैशाली के बारे में विस्तार से जानकारी दी। भंते धम्मज्योति ने बताया कि आम्रपाली का जैविक माता-पिता का पता नहीं है। वह वैशाली के पास अंबारा नामक एक गांव में आम के एक पेड़ के नीचे मिली थीं।महानमन नामक एक व्यक्ति ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में पाला था। आम के पेड़ के नीचे मिलने के कारण उनका नाम 'आम्रपाली' रखा गया। बड़ी-बड़ी आंखें और अद्भुत सुंदरता के कारण वह किशोरावस्था में ही पूरे वैशाली में आकर्षण का केंद्र बन गईं।वैशाली के कई युवा और सामंत आम्रपाली से विवाह करना चाहते थे। इस बात को लेकर राज्य में तनाव और गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।वैशाली की गणराज्य सभा ने शांति और अखंडता बनाए रखने के लिए एक निर्णय लिया।आम्रपाली को किसी एक व्यक्ति की पत्नी बनाने के बजाय पूरे नगर की नगरवधू घोषित कर दिया गया। उन्हें 'जनपदकल्याणी' की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ था कि वह राज्य की सबसे सुंदर और योग्य महिला थीं।मगध के सम्राट बिम्बिसार को जब आम्रपाली की सुंदरता के बारे में पता चला, तो वह भेष बदलकर वैशाली पहुंचे और उनसे मिले।बिम्बिसार और आम्रपाली के मिलन से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम विमल कुमार या कुमार जीवक बताया जाता है।आम्रपाली तथागत गौतम बुद्ध के संपर्क में आईं।बुद्ध के उपदेशों और अनासक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने अपना सारा वैभव और संपत्ति त्याग दी। उन्होंने बुद्ध से संघ में प्रवेश का आग्रह किया और बौद्ध भिक्षुणी बन गईं।आम्रपाली ने अपना प्रसिद्ध 'आम्रवन' उद्यान गौतम बुद्ध और उनके संघ को दान कर दिया था, जहां बुद्ध ने कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए। छठ दिन धम्म यात्रा का नेतृत्व बौद्धाचार्य विजय कुमार बौद्ध ने किया।